नींद में सुना है दीवाने न जाने कितना पैदल चल देते हैं
खामोश राहों पर वो तनहा तनहा रुख अपना मोड़ देते हैं
न सुर का पता, न ताल का कहाँ चला जा रहा है वो
बस इक लगन में अपने यार की, चलता चला जा रहा है वो !!
अजीत तलवार
मेरठ
खामोश राहों पर वो तनहा तनहा रुख अपना मोड़ देते हैं
न सुर का पता, न ताल का कहाँ चला जा रहा है वो
बस इक लगन में अपने यार की, चलता चला जा रहा है वो !!
अजीत तलवार
मेरठ
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