जिन्दगी इक मकड़ी के जाल की तरह गुजर रही है,
कभी गिरती तो कभी अपने आप ही संभल रही है
रिश्ते नाते, दोस्ती यारी, प्यार की बरसात करते हैं
फिर भी न जाने, क्यूं यह जाल में उलझती जा रही है !!
अजीत तलवार
मेरठ
कभी गिरती तो कभी अपने आप ही संभल रही है
रिश्ते नाते, दोस्ती यारी, प्यार की बरसात करते हैं
फिर भी न जाने, क्यूं यह जाल में उलझती जा रही है !!
अजीत तलवार
मेरठ
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